सड़क पर तड़पती गायें और खामोश समाज! हादसे के बाद वाहन निकल जाते हैं, फिर कहां गायब हो जाते हैं ‘गौ-रक्षक’?……

कोरबा/कटघोरा। सड़क पर किसी बेजुबान गौवंश को वाहन की चपेट में आने के बाद तड़पते देखना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए झकझोर देने वाला दृश्य है। सवाल यह है कि जब सड़क पर गायें हादसों का शिकार होती हैं, घायल होकर घंटों पड़ी रहती हैं या उनकी मौत हो जाती है, तब आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
एक तरफ गाय को आस्था और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है, दूसरी तरफ सड़क पर दुर्घटना के बाद घायल या मृत गौवंश के सामने से वाहन गुजरते रहते हैं। कई बार आरोप लगते हैं कि वाहन चालक हादसे के बाद रुकने के बजाय मौके से निकल जाते हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो यह केवल यातायात व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनशीलता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है।

जब गाय सड़क पर मरती है, तब ‘गौ-सेवा’ की आवाज क्यों कमजोर पड़ जाती है?
सबसे बड़ा सवाल उन संगठनों और लोगों से भी है जो समय-समय पर गौ-सेवा और गौ-संरक्षण की बात करते हैं।
जब किसी गाय की सड़क दुर्घटना में मौत होती है, तब मौके पर पहुंचकर उसकी सुध लेने की व्यवस्था कितनी सक्रिय है?
क्या सिर्फ धार्मिक आयोजनों, नारों और सोशल मीडिया पोस्ट तक ही गौ-सेवा सीमित रहनी चाहिए?
अगर कोई गाय सड़क पर घायल पड़ी है तो उसे उपचार तक पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर तत्काल प्रतिक्रिया व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?
और यदि लगातार हादसे हो रहे हैं तो प्रशासन, नगर निकाय, पशुपालन विभाग, पुलिस, गौशाला संचालक और सामाजिक संगठनों के बीच समन्वय क्यों नजर नहीं आता?
क्या सत्ता बदलने से सवाल पूछने का तरीका भी बदल गया?
इस पूरे मुद्दे का एक राजनीतिक पहलू भी है, जिस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आज प्रदेश में भाजपा की सरकार है। ऐसे में सवाल उठता है कि जो संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता पिछली सरकारों के समय गौवंश को लेकर मुखर नजर आते थे, क्या वे आज भी उसी मजबूती से सरकार और प्रशासन से सवाल पूछ रहे हैं?
सत्ता किसी भी दल की हो—गौवंश की सुरक्षा राजनीतिक मुद्दा नहीं, व्यवस्था और संवेदनशीलता का विषय होना चाहिए।
यदि भाजपा सरकार है तो इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सरकार से सवाल नहीं पूछे जाएं। बल्कि लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दल की सरकार से भी उतने ही कड़े सवाल पूछे जाने चाहिए जितने विपक्ष की सरकार से पूछे जाते हैं।
गाय सड़क पर क्यों पहुंच रही है, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
सिर्फ वाहन चालक को दोष देकर समस्या खत्म नहीं होगी।
सवाल यह भी है कि बड़ी संख्या में गौवंश सड़कों पर क्यों घूम रहा है?
– क्या पर्याप्त गौशालाएं हैं?
– क्या गौशालाओं की नियमित निगरानी होती है?
– क्या पशुओं की टैगिंग और पहचान की व्यवस्था प्रभावी है?
– क्या रात में सड़क पर बैठे पशुओं को हटाने की व्यवस्था है?
– क्या दुर्घटना के बाद घायल पशु के लिए तत्काल रेस्क्यू टीम उपलब्ध है?
– क्या वाहन चालकों को ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों के बारे में चेतावनी दी जाती है?
– क्या दुर्घटना में घायल या मृत पशु के मामले में जिम्मेदारी तय होती है?
ये सवाल किसी एक व्यक्ति या संगठन के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से हैं।
सड़क पर गाय—वाहन चालक भी खतरे में, गौवंश भी
सड़कों पर पशुओं की मौजूदगी सिर्फ पशुओं के लिए ही खतरा नहीं है। वाहन चालक भी अचानक सामने आए पशु से टकराकर गंभीर दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में भी सड़क पर आवारा पशुओं को दुर्घटनाओं से जुड़े कारणों में शामिल किया गया है।
खासकर रात के समय सड़क पर बैठे काले या कम दिखाई देने वाले पशु अचानक वाहन के सामने आ जाएं तो स्थिति और खतरनाक हो जाती है।
ऐसे में समाधान केवल भावनात्मक अपील से नहीं निकलेगा। स्थायी और जिम्मेदार व्यवस्था बनानी होगी।
‘गौ-माता’ कहने से नहीं, सड़क पर उसकी जान बचाने से साबित होगी संवेदना
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम गाय को वास्तव में कितना सम्मान देते हैं?
यदि गाय हमारे लिए पूजनीय है तो सड़क पर दुर्घटना के बाद उसके घायल शरीर को देखकर हम आगे कैसे निकल सकते हैं?
यदि गौ-रक्षा हमारे लिए महत्वपूर्ण है तो दुर्घटना संभावित सड़कों पर नियमित निगरानी क्यों नहीं?
यदि गौ-सेवा हमारी संस्कृति का हिस्सा है तो घायल गौवंश के लिए स्थानीय स्तर पर हेल्पलाइन, रेस्क्यू वाहन और उपचार की व्यवस्था क्यों नहीं?
और यदि सरकार गौवंश संरक्षण को लेकर गंभीर है तो प्रशासनिक स्तर पर इसकी नियमित समीक्षा क्यों न हो?
हिंदू संगठनों से भी सीधा सवाल—आवाज सिर्फ तब क्यों जब मुद्दा राजनीतिक हो?
यह सवाल किसी विशेष संगठन को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए है।
क्या गौ-सेवा का अर्थ केवल तब आवाज उठाना है जब किसी घटना से राजनीतिक माहौल गर्म हो?
या फिर सड़क पर पड़ी घायल गाय को अस्पताल पहुंचाना, मृत पशु को सम्मानपूर्वक हटवाना, गौशाला की व्यवस्था की निगरानी करना और प्रशासन से लगातार जवाब मांगना भी गौ-सेवा का हिस्सा है?
अगर किसी संगठन को लगता है कि प्रशासन अपना काम ठीक से नहीं कर रहा, तो उसे ज्ञापन देना चाहिए, अधिकारियों से जवाब मांगना चाहिए और जरूरत पड़े तो शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन भी करना चाहिए।
सरकार से भी सवाल—जवाबदेही तय होगी या फिर अगली दुर्घटना का इंतजार?
सवाल सिर्फ हिंदू संगठनों से नहीं है। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सड़कों पर गौवंश की समस्या को लेकर स्थानीय प्रशासन को अभियान चलाना चाहिए। दुर्घटना संभावित स्थानों की पहचान होनी चाहिए। पशु मालिकों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। गौशालाओं की क्षमता और व्यवस्था की निगरानी होनी चाहिए तथा घायल पशुओं के लिए त्वरित रेस्क्यू व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
क्योंकि किसी सड़क पर एक गाय की मौत सिर्फ एक पशु की मौत नहीं है—यह उस व्यवस्था की विफलता का संकेत भी हो सकती है, जो उसे सुरक्षित रखने में नाकाम रही।
अब सवाल जनता का भी है
हम अक्सर सरकार, संगठन और प्रशासन से सवाल करते हैं, लेकिन समाज की अपनी जिम्मेदारी भी है।
यदि कोई वाहन गाय को टक्कर मार देता है और चालक भाग जाता है, तो प्रत्यक्षदर्शी घटना की सूचना पुलिस या संबंधित पशु-सेवा व्यवस्था को दे सकते हैं। घायल पशु को सुरक्षित उपचार तक पहुंचाने में मदद की जा सकती है।
जरूरत है कि गौ-सेवा नारों से निकलकर सड़क और जमीन पर दिखाई दे।
सबसे बड़ा सवाल आखिर यही—
1 सड़क पर तड़पती गाय देखकर कितने लोग रुकेंगे?
2 हादसे के बाद कितने वाहन चालक जिम्मेदारी निभाएंगे?
3 गौ-रक्षा की बात करने वाले संगठन मौके पर कितनी जल्दी पहुंचेंगे?
और सरकार व प्रशासन कब ऐसी स्थायी व्यवस्था बनाएंगे कि सड़क पर गौवंश हादसे का शिकार ही न हो?
सत्ता भाजपा की हो या किसी अन्य दल की—गाय की जान और इंसान की जान दोनों की सुरक्षा राजनीति से ऊपर होनी चाहिए।
अब समय है कि नारे कम हों और जमीन पर काम ज्यादा दिखाई दे।




