https://diwanexpressnews.live/wp-content/uploads/2024/01/jjujuu.gifक्राइमछत्तीसगढ़टेक्नोलॉजीटॉप न्यूज़राजनीतिराज्यलोकल न्यूज़

आहरण नदी में रेत का कथित काला खेल! “माहवारी” के आरोपों ने मचाई खलबली—खनिज और पुलिस विभाग की चुप्पी पर सीधा सवाल, आखिर किसके संरक्षण में बेखौफ चल रहा कारोबार?..….

बरतराई में कथित अवैध बालू उत्खनन-परिवहन को लेकर सनसनीखेज दावे, नरेंद्र पटेल का नाम चर्चा में—“विधायक का भाई” बताकर दबदबा कायम करने के आरोप; अब प्रशासनिक जांच से खुलेगा रेत कारोबार का राज

बरतराई/पोंडीउपरोड़ा/कोरबा। बरतराई पंचायत की आहरण नदी में कथित बालू के अवैध कारोबार को लेकर मामला अब बेहद गंभीर सवालों के घेरे में पहुंचता दिखाई दे रहा है। स्थानीय स्तर पर सामने आ रहे आरोपों के बीच अब कटघोरा खनिज विभाग और पुलिस विभाग को कथित रूप से “माहवारी” दिए जाने की जानकारी सूत्रों के हवाले से सामने आने का दावा किया जा रहा है। हालांकि इस कथित लेन-देन की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और न ही संबंधित विभागों अथवा आरोपित पक्ष का आधिकारिक पक्ष सामने आया है।

 

लेकिन यदि इस तरह के आरोप सामने आ रहे हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी कथित मासिक लेन-देन के कारण अवैध रेत कारोबार पर कार्रवाई नहीं हो रही?

 

अगर आरोप निराधार हैं तो विभागों को जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि जांच में किसी प्रकार का अवैध लेन-देन सामने आता है, तो यह केवल रेत चोरी का मामला नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल होगा।

“माहवारी” की चर्चा ने बढ़ाई सनसनी—कौन ले रहा, कौन दे रहा और किसके इशारे पर?

स्थानीय सूत्रों के हवाले से जिस कथित “माहवारी” की चर्चा सामने आ रही है, वह इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू बन गया है।

यदि किसी अवैध कारोबार को नियमित रूप से किसी अधिकारी, कर्मचारी या प्रभावशाली व्यक्ति तक कथित भुगतान पहुंचाकर संरक्षण दिए जाने की बात कही जा रही है, तो इसकी जांच केवल कागजों पर नहीं, बल्कि मैदानी स्तर पर और वित्तीय लेन-देन की जांच के माध्यम से होनी चाहिए।

 

सवाल सीधे हैं—

 

कथित माहवारी किसे दी जाती है?

 

किस माध्यम से दी जाती है?

 

किसके कहने पर दी जाती है?

 

क्या इसके बदले वाहनों को कथित रूप से खुली छूट मिलती है?

 

और यदि ऐसा कुछ नहीं है, तो फिर आहरण नदी में कथित गतिविधियों पर कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही?

विधायक का “भाई” बताकर कथित दबदबा—क्या राजनीतिक नाम बन गया सुरक्षा कवच?

 

इस पूरे प्रकरण में नरेंद्र पटेल का नाम भी स्थानीय आरोपों में सामने आ रहा है। आरोप है कि वे स्वयं को विधायक पटेल का भाई बताते हुए कथित राजनीतिक पहुंच का हवाला देते हैं।

 

यह दावा सही है या नहीं, इसकी पुष्टि संबंधित विधायक और आधिकारिक जांच से ही हो सकती है।

 

लेकिन सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति राजनीतिक संबंधों का हवाला देकर अपना प्रभाव कायम करता है, तो क्या प्रशासन को ऐसे दावों की सत्यता की जांच नहीं करनी चाहिए?

किसी विधायक का नाम लेना अपने आप में अपराध नहीं है। मगर यदि किसी राजनीतिक पहचान का इस्तेमाल कथित अवैध कारोबार या प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए किया जा रहा हो, तो यह गंभीर विषय है।

आहरण नदी में बालू—कानून का राज या कथित रसूख का?

 

ग्रामीणों की शिकायतों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार नदी क्षेत्र में बालू के उत्खनन और परिवहन को लेकर गतिविधियां जारी रहने की बात कही जा रही है।

 

यदि नदी से वैध अनुमति के बिना बालू निकाली जा रही है, तो यह खनिज नियमों का उल्लंघन हो सकता है।

 

और यदि अनुमति मौजूद है, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि—

 

किसके नाम अनुमति है?

 

कितनी मात्रा की अनुमति है?

 

कहां से खनन किया जा रहा है?

 

कितना खनन हो चुका है?

 

किन वाहनों से परिवहन हो रहा है?

 

क्या सभी वाहनों के पास वैध ई-रवन्ना/परिवहन दस्तावेज हैं?

 

इन सवालों के जवाब ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।

 

करोड़ों के पुल पर भारी वाहन—रेत का कारोबार या सरकारी संपत्ति पर जोखिम?

 

कथित रेत परिवहन में भारी वाहनों के इस्तेमाल और पुल से आवाजाही की शिकायत भी सामने आ रही है।

यदि रेत से लदे भारी वाहन लगातार ऐसे पुल से गुजर रहे हैं जिसकी निर्धारित भार क्षमता सीमित है, तो संबंधित तकनीकी विभाग को तत्काल निरीक्षण करना चाहिए।

 

सरकारी पुल कमजोर हुआ तो नुकसान किसका होगा?—जनता का।

 

पुल क्षतिग्रस्त हुआ तो पैसा किसका लगेगा?—सरकार का।

 

और अगर दुर्घटना हुई तो जिम्मेदारी किसकी होगी?—यह प्रशासन को पहले ही तय करना होगा।

 

सिंचाई पुलिया पर भी कथित भारी वाहनों की आवाजाही

 

ग्रामीणों का आरोप है कि नदी से बालू निकालकर ट्रैक्टरों अथवा अन्य साधनों से ले जाने और आगे भारी वाहनों में परिवहन करने के दौरान सिंचाई पुलिया का इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

यदि यह सही है तो पुलिया की तकनीकी क्षमता और उसकी वर्तमान स्थिति की जांच आवश्यक है।

 

क्योंकि किसी कथित रेत कारोबार के लिए ग्रामीणों की सिंचाई व्यवस्था और सरकारी निर्माण को जोखिम में नहीं डाला जा सकता।

 

खनिज विभाग की चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल

 

अवैध खनन रोकना खनिज विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसे में आहरण नदी को लेकर लगातार आरोप सामने आने के बावजूद यदि मौके पर स्पष्ट कार्रवाई दिखाई नहीं देती, तो विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

 

क्या विभाग ने औचक निरीक्षण किया?

 

क्या नदी क्षेत्र की जांच हुई?

 

क्या वाहनों की धरपकड़ हुई?

 

क्या रॉयल्टी और परिवहन दस्तावेज जांचे गए?

 

क्या ओवरलोडिंग की जांच की गई?

 

क्या किसी जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ प्रकरण बनाया गया?

 

यदि इन सवालों के जवाब नहीं हैं तो विभाग को जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

 

पुलिस भी घेरे में—आखिर कार्रवाई कब?

 

यदि कथित अवैध रेत परिवहन की जानकारी पुलिस तक पहुंच रही है, तो पुलिस को भी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।

 

कथित “माहवारी” के आरोप सामने आने के बाद तो जांच की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

 

क्योंकि अगर आरोप झूठे हैं तो उन्हें झूठा साबित करने के लिए जांच जरूरी है।

 

और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों तक पहुंचना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

 

मामला केवल बालू का नहीं, सिस्टम की साख का है

 

आहरण नदी का कथित रेत कारोबार अब एक सामान्य अवैध खनन शिकायत से आगे बढ़ चुका है।

 

एक तरफ राजनीतिक रसूख का कथित इस्तेमाल, दूसरी तरफ भारी वाहनों की आवाजाही, तीसरी तरफ पुल-पुलियों की सुरक्षा और अब खनिज-पुलिस को कथित “माहवारी” दिए जाने की चर्चा—इन सभी बिंदुओं ने प्रशासन के सामने बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

 

अब सवाल यह नहीं कि बालू कौन निकाल रहा है—सवाल यह है कि कथित कारोबार के पीछे कौन खड़ा है और यदि अवैधता है तो उसे रोकने वाला तंत्र आखिर कहां है?

 

प्रशासन यदि इस पूरे मामले की संयुक्त एवं निष्पक्ष जांच कराए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है।

 

नदी की पैमाइश हो, खनन की मात्रा का मिलान हो, वाहनों के दस्तावेज जांचे जाएं, पुल-पुलियों का तकनीकी परीक्षण कराया जाए और कथित “माहवारी” के आरोपों की भी स्वतंत्र जांच हो।

 

क्योंकि अगर सब कुछ नियमसम्मत है तो जांच से डरने की कोई वजह नहीं।

 

और अगर कहीं नियमों के नाम पर रेत का कथित साम्राज्य खड़ा किया गया है, तो अब केवल नदी की रेत नहीं—पूरे कथित नेटवर्क की परतें खोलने की जरूरत है।

 

खनिज विभाग और पुलिस से जनता का सीधा सवाल—आहरण नदी की सच्चाई सामने लाने के लिए अब कार्रवाई कब होगी?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!