गरीबों के हक पर डाका या राहत की राशि का खेल? स्वेच्छानुदान योजना में 26.65 लाख के वितरण पर उठे गंभीर सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग तेज…..
377 हितग्राहियों के नाम पर लाखों रुपये स्वीकृत, लेकिन क्या वास्तविक गरीबों तक पहुंची सहायता? पात्रता, पारदर्शिता और वितरण प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल

कोरबा। मुख्यमंत्री एवं मंत्री स्वेच्छानुदान योजना का उद्देश्य समाज के उन गरीब, असहाय, गंभीर बीमारी से पीड़ित, दुर्घटना प्रभावित तथा आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों को राहत प्रदान करना है, जिनके पास जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने तक के संसाधन नहीं होते। लेकिन कोरबा जिले में वर्ष 2025-26 के अंतर्गत 377 हितग्राहियों के लिए 26 लाख 65 हजार रुपये के वितरण संबंधी आदेश सामने आने के बाद योजना की पारदर्शिता और वास्तविक लाभार्थियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
जिले के सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि यह राशि वास्तव में गरीबों और जरूरतमंदों तक पहुंची है तो इसकी पूरी सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए। वहीं यदि जांच में यह सामने आता है कि अपात्र, प्रभावशाली या आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को लाभ पहुंचाया गया और वास्तविक गरीब वंचित रह गए, तो यह सरकारी योजना की मूल भावना के साथ बड़ा अन्याय होगा।

क्या गरीबों के नाम पर सरकारी खजाने से हो रहा खेल?
स्वेच्छानुदान योजना का उद्देश्य किसी प्रभावशाली व्यक्ति को आर्थिक लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि उस गरीब परिवार का सहारा बनना है जो इलाज, शिक्षा या अन्य आकस्मिक संकट से जूझ रहा हो। ऐसे में नागरिक पूछ रहे हैं कि 377 लाभार्थियों का चयन किन मापदंडों के आधार पर किया गया? क्या सभी की पात्रता का सत्यापन हुआ? क्या सभी आर्थिक रूप से कमजोर थे? क्या पूरी प्रक्रिया पारदर्शी थी?
सार्वजनिक हो लाभार्थियों की सूची

लोगों की मांग है कि प्रत्येक हितग्राही का नाम, पता, स्वीकृत राशि तथा पात्रता का आधार सार्वजनिक किया जाए ताकि जनता स्वयं देख सके कि सरकारी धन वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचा या नहीं।
सामाजिक ऑडिट और स्वतंत्र जांच की मांग
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि के वितरण के बाद सामाजिक ऑडिट कराया जाना चाहिए। यदि कहीं फर्जी दस्तावेज, अपात्र लाभार्थी, पक्षपात या नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता के सवाल
क्या सभी 377 हितग्राही वास्तव में पात्र थे?
क्या लाभार्थियों की आय और आर्थिक स्थिति का सत्यापन हुआ?
क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को अनुचित लाभ मिला?
क्या कोई वास्तविक गरीब इस योजना से वंचित रह गया?
क्या पूरी सूची सार्वजनिक की जाएगी?
पारदर्शिता ही खत्म करेगी संदेह
जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि प्रशासन पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक कर देता है तो सभी संदेह स्वतः समाप्त हो जाएंगे। लेकिन यदि जानकारी छिपाई जाती है तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
जांच से ही सामने आएगा सच
जनता ने जिला प्रशासन, लोकायुक्त, आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) तथा एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी भी स्तर पर सरकारी धन के दुरुपयोग, फर्जीवाड़े या अपात्र व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
गरीबों की सहायता के लिए बनाई गई योजनाएं तभी सार्थक होंगी जब उनका लाभ वास्तव में गरीबों तक पहुंचे। इसलिए इस पूरे मामले में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।




