सफलता की प्रेरक कहानी: प्राकृतिक खेती की मिसाल बनीं कोरबा की किसान शांति देवी, हरित खाद तकनीक से बदल रही खेती की तस्वीर…..
जवाली की महिला किसान ने पेश किया अनूठा उदाहरण, ढेंचा और मूंग की हरित खाद से तैयार की उपजाऊ जमीन, अब कम लागत में बेहतर धान उत्पादन की उम्मीद

कोरबा। रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता, खेती की बढ़ती लागत और लगातार कमजोर होती मिट्टी के बीच कोरबा जिले की एक महिला किसान ने प्राकृतिक खेती की दिशा में ऐसा प्रेरणादायी कदम उठाया है, जो पूरे जिले ही नहीं बल्कि प्रदेश के किसानों के लिए मिसाल बनता जा रहा है। विकासखंड कटघोरा की ग्राम पंचायत जवाली से जुड़ी कृषक शांति देवी, पति श्री मदनलाल राजपूत, निवासी दीपका ने अपनी 3.775 एकड़ कृषि भूमि में प्राकृतिक एवं जैविक खेती की उन्नत तकनीक अपनाकर यह साबित कर दिया है कि यदि किसान वैज्ञानिक सलाह और आधुनिक कृषि तकनीकों के साथ प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करें तो कम लागत में अधिक उत्पादन के साथ मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनाई जा सकती है।
बालाजी फ्यूल्स पेट्रोल पंप के समीप स्थित अपने खेत में शांति देवी ने हरित खाद (ग्रीन मैन्योर) आधारित प्राकृतिक खेती का सफल प्रयोग किया है। यह प्रयोग आज क्षेत्र के किसानों के बीच चर्चा का विषय बन गया है और कई किसान इसे देखने तथा समझने के लिए उनके खेत का निरीक्षण कर रहे हैं।
यह पहल छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्राकृतिक खेती, जैविक कृषि एवं मृदा स्वास्थ्य संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित योजनाओं की सफलता का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई है।
वैज्ञानिक मार्गदर्शन में अपनाई हरित खाद तकनीक

कृषक शांति देवी को आदिवासी सेवा सहकारी समिति मर्यादित, जवाली (पंजीयन क्रमांक-3054) के माध्यम से ढेंचा (गुजरात किस्म) एवं मूंग (विराट किस्म) का प्रमाणित बीज उपलब्ध कराया गया।
इस संपूर्ण प्रक्रिया में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO) मीनाक्षी ठाकुर द्वारा समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया। उनके निर्देशन में वर्षा प्रारंभ होने के बाद जून माह में खेत की तैयारी कर ढेंचा एवं मूंग की बुवाई की गई। लगभग 30 से 40 दिनों तक फसल के पर्याप्त विकसित होने के बाद उसे ट्रैक्टर से जुताई कर मिट्टी में मिला दिया गया।
इस प्रक्रिया से खेत में प्राकृतिक रूप से जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ी तथा बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन भूमि में समाहित हो गई। अब इसी खेत में आगामी दिनों में धान की रोपाई की जाएगी, जिससे बेहतर उत्पादन मिलने की पूरी संभावना है।

ढेंचा और मूंग क्यों हैं किसानों के लिए वरदान?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ढेंचा एवं मूंग जैसी दलहनी फसलें हरित खाद के रूप में अत्यंत लाभकारी होती हैं। इनकी जड़ों में पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर कर देते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता प्राकृतिक रूप से बढ़ती है।
इसके साथ ही—
1- मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है।
2- लाभदायक सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है।
3- जल धारण क्षमता में सुधार होता है।
4- भूमि की संरचना मजबूत होती है।
5- रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता काफी कम हो जाती है।
6- धान सहित अन्य फसलों की वृद्धि अधिक स्वस्थ एवं संतुलित होती है।
7- उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृद्धि होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान लगातार इस तकनीक को अपनाएं तो कुछ वर्षों में भूमि की प्राकृतिक उर्वरता पुनः स्थापित हो सकती है।
कम लागत, अधिक उत्पादन और सुरक्षित पर्यावरण
आज अधिकांश किसान यूरिया, डीएपी, एसएसपी, पोटाश एवं अन्य रासायनिक उर्वरकों पर भारी खर्च कर रहे हैं। इसके बावजूद मिट्टी की गुणवत्ता लगातार गिर रही है। ऐसे समय में हरित खाद आधारित प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आ रही है।
इस तकनीक से खेती की लागत घटती है, भूमि की उर्वरता बढ़ती है, जल संरक्षण होता है, पर्यावरण सुरक्षित रहता है तथा किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायता मिलती है।
महिला किसानों के लिए भी बनी प्रेरणा
शांति देवी ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि किसान नई तकनीक सीखने की इच्छा रखें और कृषि विभाग के वैज्ञानिक मार्गदर्शन का पालन करें तो खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है। उनकी यह पहल क्षेत्र की महिला किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
सरकार के प्राकृतिक खेती अभियान को मिल रही मजबूती
केंद्र सरकार एवं छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्राकृतिक खेती, जैविक कृषि तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए लगातार विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, उन्नत बीज तथा आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है।
ग्राम जवाली की यह पहल दर्शाती है कि सरकारी योजनाओं का सही उपयोग कर किसान आत्मनिर्भर एवं टिकाऊ खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकते हैं।
पूरे प्रदेश के लिए बन सकता है आदर्श मॉडल
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को जिले के अन्य गांवों में भी अपनाया जाए तो रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी, खेती की लागत घटेगी और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। साथ ही भूमि की सेहत लंबे समय तक सुरक्षित रहेगी।
जवाली की यह सफलता केवल एक किसान की उपलब्धि नहीं, बल्कि प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते भारत की एक मजबूत तस्वीर है। यदि इस प्रकार के नवाचारों को व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार मिले तो यह पहल प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है। स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों एवं समाचार माध्यमों के जरिए इस मॉडल को व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। भविष्य में यह प्रेरक पहल राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना प्राप्त कर सकती है और प्राकृतिक खेती के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में अपनी अलग पहचान बना सकती है।




