आखिर कब तक खामोश रहेगा प्रशासन? शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं, पत्रकारों की सुरक्षा और चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर उठे सवाल……

कोरबा। पुलिस अधीक्षक को लिखित आवेदन देकर जान-माल की सुरक्षा की मांग किए जाने के कई दिन बीत जाने के बावजूद यदि अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई कब होगी? यदि किसी व्यक्ति, विशेषकर पत्रकार, ने अपनी सुरक्षा को लेकर आशंका व्यक्त की है, तो मामले का समयबद्ध परीक्षण और आवश्यक कार्रवाई प्रशासन की जिम्मेदारी है।

पत्रकार विष्णु कुमार यादव द्वारा दिए गए आवेदन में कुछ व्यक्तियों से जान का खतरा होने का आरोप लगाया गया है। इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच से ही हो सकता है, लेकिन शिकायत लंबित रहने से स्थानीय स्तर पर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना जाता है। यदि किसी पत्रकार को समाचार प्रकाशित करने, भ्रष्टाचार या जनहित के मुद्दे उठाने पर दबाव, धमकी या भय का सामना करना पड़ रहा है, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष पत्रकारिता से जुड़ा गंभीर विषय है। हालांकि, किसी भी नेता, मंत्री या अन्य व्यक्ति पर आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष जांच के बाद ही की जा सकती है।
अब मांग उठ रही है कि पुलिस इस पूरे मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करे, शिकायतकर्ता की सुरक्षा का आकलन करे और यदि किसी प्रकार की आपराधिक धमकी या दबाव के साक्ष्य मिलते हैं तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करे।
जनता के बीच भी यह चर्चा तेज है कि यदि जनहित के मुद्दे उठाने वालों की शिकायतों पर ही कार्रवाई में देरी होगी, तो भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के मामलों को उजागर करने का साहस कौन करेगा? इसलिए आवश्यक है कि प्रशासन निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानून के शासन का परिचय देते हुए पूरे मामले का शीघ्र खुलासा करे।

सवाल अब भी कायम हैं—
शिकायत के बाद अब तक क्या कार्रवाई हुई?
शिकायतकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए?
क्या मामले की निष्पक्ष जांच शुरू हुई?
यदि नहीं, तो देरी का कारण क्या है?
जनता की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति पर, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।




