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पसान में ‘जंगल राज’! सरकारी क्वार्टर और जंगल भूमि पर कब्जा, ढाई महीने बाद भी प्रशासन बेबस…..

कोरबा जिले के सीमांत क्षेत्र पसान में सरकारी संपत्ति पर कथित कब्जे का मामला अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। ग्राम सेवक आवास, सरकारी गोदाम और रिकॉर्ड में दर्ज जंगल भूमि पर वर्षों से कब्जे के आरोप लग रहे हैं, लेकिन शिकायत के ढाई महीने बाद भी प्रशासन कार्रवाई नहीं कर पाया। इससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी है और शासन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि पुराने कांग्रेसी नेता साजिद इराकी ने खसरा नंबर 180/2 स्थित लगभग 6 डिसमिल सरकारी भूमि पर बने ग्राम सेवक क्वार्टर और गोदाम को निजी कब्जे में ले रखा है। इतना ही नहीं, सरकारी गोदाम को तोड़कर वहां निजी मकान निर्माण कराए जाने की बात भी सामने आई है।

 

ग्रामवासी रामशरण सिंह तंवर, राजकुमार एवं विकास द्वारा 20 फरवरी 2026 को SDM कार्यालय पोंडी उपरोड़ा और तहसीलदार कार्यालय पसान में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत के बाद तहसीलदार द्वारा स्टे ऑर्डर जारी किया गया, लेकिन आरोप है कि आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गया और निर्माण कार्य आज भी जारी है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि एक सामान्य व्यक्ति सरकारी भूमि पर छोटी-सी झोपड़ी भी बना ले, तो प्रशासन तत्काल बुलडोजर लेकर पहुंच जाता है। लेकिन इस मामले में ढाई महीने बीत जाने के बावजूद कब्जा नहीं हटाया जा सका। इससे प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

मामले को लेकर ग्रामीणों ने स्थानीय नेताओं पर संरक्षण देने का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आरोपी खुलेआम यह दावा करता है कि “हम नेताओं को चुनाव जितवाते हैं, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक चुप्पी इन दावों को मजबूती दे रही है।

सबसे गंभीर पहलू यह है कि खसरा नंबर 180/1, 180/2 और 180/4 की सम्मिलित भूमि रिकॉर्ड में “बड़े झाड़ के जंगल” मद में दर्ज बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जंगल भूमि पर कथित अतिक्रमण और निर्माण कार्य आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है? क्या वन विभाग और राजस्व विभाग को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?

मुख्यमंत्री के “सुशासन” और “भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन” के दावों के बीच पसान का यह मामला शासन-प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा धब्बा बनता दिख रहा है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि आखिर सरकारी संपत्तियों को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है? और यदि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होगी, तो आम जनता न्याय के लिए कहां जाएगी?

इस पूरे मामले में तहसीलदार पसान और SDM पोंडी उपरोड़ा से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनका कोई आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आ सका।

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