गरीबों के हक़ पर डाका? स्वेच्छानुदान राशि के वितरण पर उठे गंभीर सवाल, भाजपा कटघोरा मंडल अध्यक्ष, उद्योगपति और कथित रूप से राष्ट्रीय चैनल से जुड़े व्यक्ति को भी मिला लाभ…..

कोरबा। मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर, गरीब, बेसहारा, गंभीर बीमारी से पीड़ित तथा आकस्मिक संकट से जूझ रहे जरूरतमंद लोगों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। लेकिन जिले में इस योजना के तहत स्वीकृत कुछ प्रकरणों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि वास्तविक पात्र हितग्राहियों की बजाय आर्थिक रूप से सक्षम एवं प्रभावशाली लोगों को भी इस योजना का लाभ प्रदान किया गया।

आरोपों के अनुसार, भाजपा कटघोरा मंडल अध्यक्ष अभिषेक गर्ग, सुनीता जायसवाल तथा स्वयं को राष्ट्रीय चैनल में कार्यरत बताने वाले शशिकांत डिक्सेना को भी मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से आर्थिक सहायता राशि स्वीकृत की गई। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह योजना के मूल उद्देश्य और पात्रता प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान जैसी योजनाएं उन गरीब, बेसहारा एवं आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों के लिए बनाई गई हैं, जिनके पास उपचार, जीवन-यापन या आकस्मिक परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते। यदि आर्थिक रूप से सक्षम अथवा प्रभावशाली व्यक्तियों को इसका लाभ दिया गया है, तो इससे वास्तविक जरूरतमंदों का अधिकार प्रभावित हो सकता है।
क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि यदि राजनीतिक प्रभाव, रसूख या सिफारिश के आधार पर हितग्राहियों का चयन किया गया है, तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ जाती है। ऐसे में आवश्यक है कि मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से स्वीकृत सभी प्रकरणों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा प्रत्येक हितग्राही की पात्रता का दस्तावेजों के आधार पर सत्यापन किया जाए।
सामाजिक संगठनों एवं जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि जिले में स्वेच्छानुदान मद से लाभान्वित सभी हितग्राहियों की सूची सार्वजनिक की जाए, पात्रता के मापदंडों की समीक्षा की जाए तथा यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन, पक्षपात या अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इस पूरे मामले को लेकर एक और सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि समाचार प्रकाशित होने और आरोप सार्वजनिक रूप से सामने आने के बावजूद अब तक संबंधित मंत्री एवं वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से किसी स्पष्ट जांच या कार्रवाई की जानकारी सामने क्यों नहीं आई। इससे लोगों के बीच कई तरह की आशंकाएं जन्म ले रही हैं।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या गरीबों और जरूरतमंदों के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ वास्तव में पात्र लोगों तक पहुंच रहा है, या फिर प्रभाव, पहुंच और सिफारिश के आधार पर सरकारी सहायता का वितरण किया जा रहा है? इन सभी सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष, पारदर्शी और दस्तावेजों पर आधारित जांच से ही सामने आ सकता है।




