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पाली में रेत का काला कारोबार बेखौफ! प्रतिबंध के बावजूद नदी-नालों से धड़ल्ले से उठ रही रेत, विभागीय कार्रवाई पर उठे सवाल…..

सुबह की भोर और शाम का अंधेरा बना अवैध रेत परिवहन का सहारा, शासन को लाखों की राजस्व क्षति का आरोप

कोरबा/पाली :-  जिला प्रशासन द्वारा मानसून अवधि में रेत खनन पर लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद पाली क्षेत्र में कथित अवैध रेत खनन और परिवहन का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम अनदेखी करते हुए नदी-नालों से रेत निकालकर ट्रैक्टरों के माध्यम से परिवहन किए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। हालात यह हैं कि कार्रवाई से बचने के लिए अब कथित तौर पर रेत लोड ट्रैक्टर दिन के बजाय सुबह भोर और देर शाम सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं।

 

जिला प्रशासन द्वारा 10 जून से 15 अक्टूबर तक रेत खनन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद पाली क्षेत्र के पोड़ी, नानपुलाली, ढुकुपथरा, मुनगाडीह सहित आसपास के नदी-नालों में अवैध उत्खनन की शिकायतें सामने आ रही हैं। मानसून के दौरान नदी-नालों में पानी का बहाव बढ़ा हुआ है, इसके बावजूद कथित रूप से जोखिम उठाकर रेत निकालने का काम जारी है।

प्रतिबंध कागजों में, जमीन पर दौड़ रहे रेत लोड ट्रैक्टर!

स्थानीय लोगों के अनुसार पहले रेत से भरे ट्रैक्टर दिनदहाड़े गांवों और मुख्य मार्गों पर नजर आते थे, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई का दबाव बढ़ने के बाद कथित रूप से समय बदल दिया गया है। अब सुबह-सुबह और देर शाम रेत लोड ट्रैक्टरों की आवाजाही देखी जा रही है।

 

ग्रामीणों का कहना है कि यदि खनन पर प्रतिबंध है तो आखिर इन ट्रैक्टरों में रेत कहां से आ रही है? क्या संबंधित विभाग को इसकी जानकारी नहीं है? यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

खनिज विभाग की भूमिका पर उठ रहे गंभीर सवाल

अवैध रेत खनन पर कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की है, लेकिन पाली क्षेत्र में लगातार सामने आ रही शिकायतों ने विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कार्रवाई के नाम पर कभी-कभार ट्रैक्टर पकड़ने की कार्रवाई तो दिखाई जाती है, लेकिन कुछ समय बाद वही गतिविधियां दोबारा शुरू हो जाती हैं।

ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि यदि कार्रवाई प्रभावी है तो प्रतिबंधित अवधि में रेत परिवहन लगातार कैसे जारी है?

 

‘सेटिंग’ के आरोप ने बढ़ाई सनसनी, हर ट्रैक्टर से ₹5 हजार माहवारी लेने की चर्चा

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पाली क्षेत्र में अवैध रेत कारोबार को लेकर स्थानीय स्तर पर विभागीय अमले और रेत कारोबार से जुड़े लोगों के बीच कथित ‘सेटिंग’ की चर्चाएं भी जोरों पर हैं। कुछ स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं द्वारा आरोप लगाया जा रहा है कि अवैध रेत परिवहन में लगे ट्रैक्टर संचालकों से कथित रूप से ₹5,000 प्रतिमाह प्रति ट्रैक्टर लिए जाने की व्यवस्था है और इसी वजह से अवैध कारोबार पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है।

 

इन आरोपों में ‘लहरे साहब’ नाम के एक व्यक्ति की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं होने की बात कही जा रही है। हालांकि इन गंभीर आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित अधिकारी/कर्मचारी के लिए भी आवश्यक है कि वे सामने आकर इन आरोपों की स्थिति स्पष्ट करें।

 

‘ऊपर आदेश, नीचे सेटिंग’—ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश

रेत खनन प्रभावित इलाकों के ग्रामीणों का कहना है कि विभागीय अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों को नदी-नालों में चल रही गतिविधियों की जानकारी रहती है। इसके बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।

ग्रामीणों का सवाल है—यदि शासन-प्रशासन ने रेत खनन पर प्रतिबंध लगाया है, तो प्रतिबंधित अवधि में रेत से भरे ट्रैक्टर आखिर किसकी अनुमति या संरक्षण में चल रहे हैं?

 

लोगों का यह भी कहना है कि कार्रवाई केवल कुछ वाहनों को पकड़ने तक सीमित न रहे, बल्कि अवैध खनन के पीछे काम कर रहे पूरे नेटवर्क की जांच होनी चाहिए।

 

सरकारी खजाने को नुकसान, प्राकृतिक संसाधनों पर भी संकट

अवैध रेत खनन से जहां शासन को रॉयल्टी और अन्य राजस्व के रूप में मिलने वाली राशि का नुकसान होने का आरोप है, वहीं नदी-नालों से अनियंत्रित रेत निकासी पर्यावरणीय दृष्टि से भी गंभीर चिंता का विषय बन रही है। अत्यधिक रेत उत्खनन से नदी की प्राकृतिक संरचना, जल प्रवाह और आसपास के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

वहीं रेत से ओवरलोड ट्रैक्टरों की तेज आवाजाही से ग्रामीण सड़कों पर दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है। यदि किसी बड़े हादसे के बाद कार्रवाई होती है तो उससे पहले निगरानी तंत्र की निष्क्रियता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब जांच की मांग—कौन चला रहा है रेत का पूरा नेटवर्क?

स्थानीय लोगों ने मांग की है कि पाली क्षेत्र के नदी-नालों में प्रतिबंध के बावजूद हो रहे कथित रेत उत्खनन की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। नदी-नालों का स्थल निरीक्षण, रेत परिवहन में लगे ट्रैक्टरों की जांच, वाहन मालिकों से पूछताछ, सीसीटीवी/वीडियो फुटेज और मोबाइल लोकेशन सहित उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्रतिबंध के बावजूद रेत का कारोबार आखिर किसके संरक्षण में संचालित हो रहा है।

साथ ही प्रति ट्रैक्टर ₹5,000 प्रतिमाह कथित वसूली के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच कर वास्तविकता सामने लाने की मांग उठ रही है।

बहरहाल, पाली में प्रतिबंध के बावजूद कथित अवैध रेत खनन और परिवहन का मामला अब केवल रेत चोरी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह विभागीय निगरानी और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल बनता जा रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन इन गंभीर आरोपों की तह तक पहुंचकर कार्रवाई करता है या फिर रेत का यह कथित खेल इसी तरह पर्दे के पीछे चलता रहेगा।

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