कपूबहरा में कथित अवैध उत्खनन पर शिकायत के बाद भी ‘चुनिंदा कार्रवाई’! एक-दो ट्रैक्टरों पर शिकंजा, बाकी पर मेहरबानी क्यों?….
दोपहर 12:06 बजे खनिज अधिकारी को दी गई थी सूचना, कार्रवाई के निर्देश की बात सामने आई; सवाल—मौके पर जांच कब और पूरी कार्रवाई कब?

कोरबा/कटघोरा। कपूबहरा क्षेत्र में कथित अवैध उत्खनन को लेकर एक बार फिर खनिज विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले में शिकायतकर्ता द्वारा दोपहर 12:06 बजे खनिज अधिकारी को दूरभाष के माध्यम से सूचना दिए जाने की बात सामने आई है। सूचना दिए जाने के बाद कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की चर्चा भी है, लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार मौके पर अपेक्षित और ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दी। यही वजह है कि अब विभागीय निगरानी व्यवस्था और कार्रवाई की गंभीरता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
मामला केवल कथित उत्खनन तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि यदि किसी संवेदनशील क्षेत्र में नियमों के विपरीत खनन या उत्खनन की सूचना जिम्मेदार विभाग तक पहुंचती है, तो सूचना मिलने के बाद विभाग की कार्रवाई कितनी तेज और प्रभावी होती है?
क्या सूचना मिलते ही मौके का निरीक्षण किया गया? क्या उत्खनन स्थल की जांच हुई? क्या वहां मौजूद मशीनरी और वाहनों की जांच की गई? क्या संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किया गया? और यदि कार्रवाई हुई तो उसकी पूरी जानकारी सामने क्यों नहीं आ रही?
सूचना मिली, कार्रवाई के निर्देश भी हुए… फिर मौके पर क्या हुआ?
बताया गया है कि मामले की जानकारी खनिज विभाग तक पहुंचाई गई थी। इसके बाद कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की बात भी सामने आई। लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि निर्देश के बावजूद जमीन पर ऐसी कोई ठोस और व्यापक कार्रवाई नजर नहीं आई, जिससे कथित उत्खनन पर तत्काल रोक लगने का स्पष्ट संदेश मिलता।
यही स्थिति अब विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर रही है।
यदि सूचना सही थी तो तत्काल मौके का निरीक्षण क्यों नहीं हुआ?
यदि मौके पर उत्खनन नहीं हो रहा था तो विभाग इसकी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?
और यदि उत्खनन नियमों के विपरीत पाया गया तो संबंधितों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई?
इन सवालों का जवाब सामने आना बेहद जरूरी है।
एक-दो ट्रैक्टरों पर कार्रवाई, बाकी पर सवाल—क्या यही है निगरानी?
कथित अवैध उत्खनन और परिवहन को लेकर स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि खनिज विभाग की कार्रवाई कहीं चुनिंदा कार्रवाई तक ही सीमित तो नहीं रह गई है।
चर्चा है कि कार्रवाई के नाम पर एक-दो ट्रैक्टरों पर शिकंजा कसता दिखाई देता है, जबकि अन्य ट्रैक्टरों एवं वाहनों के संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं होती।
क्या शिकायतें सिर्फ फोन और कागजों तक सीमित रह जाएंगी?
अवैध उत्खनन की शिकायतों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका विभागीय निरीक्षण और मौके की कार्रवाई की होती है। सिर्फ शिकायत प्राप्त कर लेना या संबंधित कर्मचारी को निर्देश देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
कार्रवाई का वास्तविक मूल्यांकन तब होता है जब अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्थिति की जांच करते हैं और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई करते हैं।
कपूबहरा मामले में भी अब यही सवाल उठ रहा है कि शिकायत के बाद विभाग ने वास्तव में क्या कदम उठाए?
क्या मौके का पंचनामा तैयार किया गया?
क्या उत्खनन की मात्रा का आकलन किया गया?
क्या मशीनों की जांच हुई?
क्या परिवहन में लगे सभी वाहनों की जानकारी जुटाई गई?
क्या खनिज के वैध दस्तावेजों का सत्यापन किया गया?
यदि इनमें से कोई कार्रवाई हुई है तो उसकी जानकारी सामने आने से मामले की वास्तविक स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है।
विभाग की चुप्पी से बढ़ रहा संदेह?
शिकायतकर्ता की ओर से सूचना दिए जाने के बावजूद यदि अपेक्षित कार्रवाई दिखाई नहीं देती, तो स्वाभाविक रूप से विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।
हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत का निष्कर्ष बिना जांच के निकालना उचित नहीं होगा।
लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि यदि विभाग को कथित अवैध उत्खनन की जानकारी समय रहते दी गई थी, तो उसके बाद विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई की गई?

यही वह बिंदु है, जिस पर अब विभाग को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
पार्टी विशेष का दबाव या किसी और वजह से सीमित कार्रवाई? जांच से सामने आएगा सच
कथित अवैध उत्खनन को लेकर स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों अथवा किसी पार्टी विशेष के दबाव जैसी चर्चाएं और आरोप भी सामने आने की बात कही जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और केवल चर्चा के आधार पर किसी राजनीतिक दल, व्यक्ति अथवा अधिकारी को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
इसी तरह कुछ लोगों द्वारा यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं किसी प्रकार के आर्थिक दबाव के कारण कार्रवाई प्रभावित तो नहीं हो रही।
‘नोटों की कड़कड़ाहट’ के कारण कार्रवाई रुकने जैसी चर्चाएं यदि कहीं हैं तो उनकी सच्चाई भी निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकती है।
यदि ये आरोप निराधार हैं तो विभाग को स्पष्ट रूप से स्थिति सामने रखनी चाहिए। वहीं यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या दबाव की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
शासन को संभावित राजस्व नुकसान का भी सवाल
यदि कपूबहरा में बिना अनुमति या नियमों के विपरीत उत्खनन की पुष्टि होती है, तो मामला केवल पर्यावरण अथवा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे शासन को संभावित राजस्व नुकसान का प्रश्न भी जुड़ सकता है।ऐसे में विभाग को कथित उत्खनन की मात्रा, खनिज की प्रकृति, परिवहन, रॉयल्टी तथा अनुमति संबंधी दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए।यदि कोई अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार जुर्माना, जब्ती और अन्य वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
12:06 बजे की सूचना अब जांच का अहम बिंदु
कपूबहरा मामले में शिकायतकर्ता द्वारा 12:06 बजे सूचना दिए जाने का दावा अब जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है।यदि कॉल और सूचना की पुष्टि होती है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सूचना प्राप्त होने के बाद विभाग ने किस अधिकारी या कर्मचारी को क्या निर्देश दिए और उसके बाद मौके पर क्या कार्रवाई हुई।
सूचना मिलने से लेकर मौके पर कार्रवाई तक का पूरा घटनाक्रम सामने आना चाहिए।
क्योंकि इसी से स्पष्ट होगा कि विभाग ने अपनी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई।
अब जवाबदेही तय करने का समय
कपूबहरा की जमीन से जुड़े इस कथित उत्खनन मामले में अब क्षेत्रवासियों की नजर खनिज विभाग की अगली कार्रवाई पर है। लोगों की मांग है कि मामले को महज शिकायत मानकर बंद न किया जाए, बल्कि निष्पक्ष स्थल निरीक्षण कराया जाए और जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।
यदि अवैध उत्खनन हुआ है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो।
यदि कोई अवैध गतिविधि नहीं मिली है तो विभाग इसकी स्पष्ट जानकारी दे।
और यदि सूचना मिलने के बावजूद किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय हो।
बड़ा सवाल—कार्रवाई आखिर कब और किस पर?
कपूबहरा में कथित उत्खनन को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या खनिज विभाग सभी संदिग्ध वाहनों और उत्खनन स्थलों की समान रूप से जांच करेगा या कार्रवाई सिर्फ एक-दो ट्रैक्टरों तक सीमित रह जाएगी?
सवाल यह भी है कि यदि मौके पर कई वाहन सक्रिय थे तो सभी की जांच क्यों नहीं?
यदि कुछ वाहनों को छोड़ा गया तो उसके पीछे क्या कारण था?
क्या उनके दस्तावेज वैध थे?
यदि हां, तो इसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
और यदि नहीं, तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्योंकि सवाल सिर्फ एक-दो ट्रैक्टरों की जब्ती का नहीं है—सवाल यह है कि खनिज संपदा की निगरानी करने वाला तंत्र शिकायत मिलने के बाद वास्तव में कितना सक्रिय और निष्पक्ष है।
फिलहाल कपूबहरा मामले में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है—दोपहर 12:06 बजे सूचना मिलने के बाद विभाग ने जमीन पर वास्तव में क्या कार्रवाई की, कितने वाहनों की जांच हुई और यदि कुछ वाहन छोड़ दिए गए तो आखिर क्यों?




