“सरपंच के बिना हस्ताक्षर कैसे निकल गई सरकारी रकम? सचिव पर फर्जी हस्ताक्षर और सील से लाखों रुपये निकालने के गंभीर आरोप, पंचायत में मचा हड़कंप”……

कटघोरा। जनपद पंचायत कटघोरा अंतर्गत ग्राम पंचायत चाकाबुड़ा में पंचायत सचिव पर लगे गंभीर आरोपों ने पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सरपंच एवं ग्राम प्रतिनिधियों द्वारा मुख्य कार्यपालन अधिकारी को सौंपे गए आवेदन में आरोप लगाया गया है कि पंचायत सचिव पंचम पाटले ने सरपंच की जानकारी और अनुमति के बिना उनके हस्ताक्षर एवं सील का कथित रूप से दुरुपयोग कर शासकीय राशि का आहरण किया तथा विभिन्न भुगतानों में गंभीर अनियमितताएं कीं।

आवेदन के अनुसार, यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है और वे सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि जालसाजी, कूटरचना, फर्जी हस्ताक्षर, सरकारी दस्तावेजों के दुरुपयोग तथा शासकीय धन के कथित गबन जैसे गंभीर पहलुओं से भी जुड़ सकता है।

आवेदन में दावा किया गया है कि पंचायत के वित्तीय अभिलेखों में ऐसे भुगतान दर्ज हैं जिनमें सरपंच के हस्ताक्षर उनकी जानकारी के बिना किए गए। सवाल यह उठ रहा है कि जब सरपंच ने हस्ताक्षर ही नहीं किए, तब भुगतान स्वीकृत कैसे हुआ? किसके आधार पर राशि निकाली गई? भुगतान की अनुमति किसने दी? और बैंकिंग प्रक्रिया में इसकी जांच कैसे नहीं हुई?
आरोप यह भी है कि विभिन्न तिथियों में पंचायत खाते से राशि निकाली गई, जिसमें सरपंच को पूरी जानकारी नहीं थी। आवेदन में दावा किया गया है कि निकाली गई राशि में से एक हिस्सा पंचायत कार्यों में खर्च हुआ, जबकि शेष राशि के संबंध में गंभीर सवाल उठाए गए हैं और जांच की मांग की गई है।

आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि सदगुरु कबीर ट्रेडर्स के नाम से एक बिल के भुगतान में भी सरपंच के कथित फर्जी हस्ताक्षर एवं सील का उपयोग करने का प्रयास किया गया, जिसे बाद में सरपंच की जानकारी में आने पर रोका गया। इस आरोप ने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि पंचायत स्तर पर सरपंच के हस्ताक्षर और सील का कथित रूप से दुरुपयोग कर सरकारी राशि निकाली जा सकती है, तो पंचायतों में लागू वित्तीय नियंत्रण प्रणाली की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।
आवेदन में मुख्य कार्यपालन अधिकारी से मांग की गई है कि मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए, संबंधित अभिलेखों, भुगतान वाउचरों, बैंक रिकॉर्ड, ई-ग्रामस्वराज पोर्टल के लेन-देन तथा हस्ताक्षरों का फोरेंसिक परीक्षण कराया जाए। साथ ही दोष सिद्ध होने पर संबंधित सचिव के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज कर विभागीय कार्रवाई एवं शासकीय राशि की वसूली की जाए।
अब निगाहें जनपद पंचायत प्रशासन पर टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पंचायतों में वित्तीय निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पर भी व्यापक बहस छेड़ सकता है।




